बी टुगेदर फॉर पीपल एंड प्लैनेट

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लेखक
आनंद पटेल
पर्यावरणविद एवं बी एक्सपर्ट, भोपाल
प्रत्येक वर्ष 20 मई को पूरी दुनिया में विश्व मधुमक्खी दिवस मनाया जाता है जो की मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। वर्ष 2026 की वैश्विक “बी टुगेदर फॉर पीपल एंड प्लैनेट” अर्थात “लोगों और पृथ्वी के लिए हम सब साथ मिलकर कार्य करें” यह संदेश देती है कि मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं का संरक्षण केवल वैज्ञानिकों या मधुमक्खी पालकों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अठारवी शताब्दी में आधुनिक मधुमक्खी पालन के जनक एंटोन जनसा की स्मृति में 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस मनाया जाता है। पहली बार यह दिवस वर्ष 2018 में मनाया गया था। तब से यह दिवस पूरी दुनिया को यह याद दिलाता है कि यदि हमें स्वस्थ पृथ्वी, सुरक्षित भोजन और समृद्ध जैव विविधता चाहिए, तो मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं की रक्षा करना अनिवार्य है।आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, जैव विविधता के क्षरण, प्रदूषण और खाद्य संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में मधुमक्खियाँ प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर उभरती हैं। यह छोटा-सा जीव कृषि उत्पादन, वनस्पति संरक्षण और पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन के अनुसार विश्व की लगभग 75% खाद्य फसलें किसी न किसी रूप में परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं, जबकि वैश्विक कृषि उत्पादन का लगभग 35% हिस्सा सीधे परागण सेवाओं से प्रभावित होता है। दुनिया में लगभग 20,000 से अधिक एवं भारत में 800 से अधिक मधुमक्खियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मधुमक्खियाँ केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कृषि और जैव विविधता की आधारशिला हैं। फल, सब्जियाँ, तिलहन, दलहन तथा अनेक वनस्पतियाँ इनके परागण पर निर्भर करती हैं। यदि परागण करने वाले जीव समाप्त हो जाएँ, तो खाद्य श्रृंखला और प्राकृतिक संतुलन दोनों गंभीर संकट में पड़ सकते हैं। यही कारण है कि मधुमक्खियों को “प्रकृति के मौन योद्धा” भी कहा जाता है।
फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन के अनुसार के अनुसार परागण करने वाले जीव विश्व की 87 प्रमुख खाद्य फसलों के उत्पादन में योगदान देते हैं और इनके बिना कई फसलों की उपज में 90 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। परागण आधारित कृषि उत्पादों का आर्थिक मूल्य वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर आँका गया है। आज मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के अस्तित्व पर अनेक खतरे मंडरा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र में बदलाव, अत्यधिक रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग, जंगलों की कटाई, शहरीकरण, प्रदूषण, प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना तथा कृषि में बढ़ती रसायन आधारित पद्धतियाँ इनके जीवन को प्रभावित कर रही हैं।आईयूसीएन की नवीन रिपोर्टों के अनुसार यूरोप में लगभग 10 प्रतिशत जंगली मधुमक्खी प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं, जबकि तितलियों की कई प्रजातियों में भी तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। आईयूसीएन ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान परिस्थितियाँ जारी रहीं, तो आने वाले वर्षों में परागण सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मधुमक्खियों का महत्व और भी अधिक है। भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही “मीठी क्रांति” और मधुमक्खी पालन से जुड़ी विभिन्न योजनाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं। इन पहलों के माध्यम से किसानों, युवाओं और ग्रामीण समुदायों को मधुमक्खी पालन से जोड़कर आजीविका के नए अवसर विकसित किए जा रहे हैं। मधुमक्खी पालन न केवल अतिरिक्त आय का स्रोत है, बल्कि यह कृषि उत्पादकता बढ़ाने और प्राकृतिक खेती को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम भी है।वर्ष 2026 की थीम विशेष रूप से इस बात पर जोर देती है कि हमें सभी को मिलकर संरक्षण गतिविधियों के माध्यम से इस नन्हे जीव एवं अन्य परागणकर्ताओं के संरक्षण हेतु सक्रिय प्रयास करने होंगे। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से मधुमक्खियों एवं अन्य परागणकर्ताओं के महत्व, जैव विविधता संरक्षण तथा सतत कृषि के प्रति जागरूकता बढ़ाना आज समय की आवश्यकता है। यदि नई पीढ़ी प्रकृति संरक्षण को अपना दायित्व समझेगी, तभी आने वाले समय में पृथ्वी सुरक्षित, संतुलित और जैव विविधता से समृद्ध रह पाएगी।विश्व मधुमक्खी दिवस मनाने का उद्देश्य केवल जागरूकता बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों को व्यवहारिक कदम उठाने के लिए प्रेरित करना भी है। हम अपने आसपास मधुमक्खी-अनुकूल पौधे और फूल लगाकर, जैविक खेती को बढ़ावा देकर, रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करके तथा वैज्ञानिक एवं सतत तरीके से शहद संग्रहण को अपनाकर इनके संरक्षण में योगदान दे सकते हैं।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “बी टुगेदर फॉर पीपल एंड प्लैनेट” की भावना को केवल एक थीम तक सीमित न रखें, बल्कि इसे जनआंदोलन का रूप दें। मधुमक्खियों का संरक्षण वास्तव
में मानवता, कृषि और पृथ्वी के भविष्य का संरक्षण है। यदि हम आज इनके लिए जागरूक और संवेदनशील बनेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, हरित और संतुलित पर्यावरण दे सकेंगे।
(UPDATED ON 19TH MAY 2026)



