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2025 में विकसित भारत की नींव मजबूती से आगे बड़ी

–लेखक–
–गणेश सिंह, सांसद सतना, —

ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक विखंडन, आपूर्ति शृंखला के पुनर्संरेखण और तकनीकी प्रतिस्पर्धा की चुनौती से जूझ रही है, भारत ने वर्ष 2025 में यह सिद्ध कर दिया है कि सुधार, स्थिरता और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।यह वर्ष केवल नीतिगत परिवर्तन का नहीं, बल्कि शासन की सोच में गुणात्मक बदलाव का प्रतीक बनकर उभरा है।

पिछले वर्ष भारत की अर्थव्यवस्था ने 8.2 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की, जबकि महँगाई नियंत्रण में रही और राजकोषीय घाटा भी प्रबंधनीय स्तर पर बना रहा। यह उपलब्धि किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि उन संरचनात्मक सुधारों का फल है, जिनका केंद्रबिंदु रहा है—विश्वास आधारित शासन।

सरकार ने कर नीति के माध्यम से सीधे उपभोग को प्रोत्साहित किया। फरवरी के बजट में ₹12 लाख तक की आय को प्रभावी रूप से कर-मुक्त कर मध्यम वर्ग के हाथों में अधिक धन छोड़ा गया। इसके बाद सितंबर में लागू किए गए जीएसटी सुधारों के अंतर्गत दो-स्लैब संरचना और सरलीकृत शासन प्रणाली ने कर अनुपालन को आसान बनाया। परिणामस्वरूप त्योहारी सीज़न में उपभोक्ता बिक्री ₹6 लाख करोड़ के स्तर तक पहुँच गई। यह ध्यान देने योग्य है कि ये कदम तत्काल राजस्व वृद्धि के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक उपभोग और निवेश चक्र को मजबूत करने के लिए उठाए गए।

भारत की अर्थव्यवस्था में घरेलू उपभोग की हिस्सेदारी लगभग 55 से 60 प्रतिशत है। ऐसे में बढ़ती मांग से क्षमता उपयोग में वृद्धि, नए निवेश और बहुगुणक प्रभाव स्वाभाविक हैं। किंतु यह तभी संभव है जब श्रमिकों की आय स्थायी और सुरक्षित हो। इसी उद्देश्य से चार आधुनिक श्रम संहिताओं के माध्यम से 29 बिखरे कानूनों को समेकित कर 64 करोड़ श्रमिकों के लिए एक पारदर्शी, सरल और सुरक्षित ढांचा तैयार किया गया है। इन सुधारों का जोर उचित वेतन, मजबूत औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा पर है।

औपचारिक रोजगार के विस्तार के साथ भविष्य निधि, पेंशन और बीमा कोषों में योगदान बढ़ेगा, जिससे पूंजी बाज़ारों को दीर्घकालिक संसाधन उपलब्ध होंगे। इसी क्रम में बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति ने न केवल प्रतिस्पर्धा और सेवा गुणवत्ता को बढ़ाया है, बल्कि इसे सामाजिक सुरक्षा के एक सशक्त माध्यम के रूप में भी स्थापित किया है।

विनियामक सुधारों के क्षेत्र में भी वर्ष 2025 निर्णायक रहा। भारतीय रिज़र्व बैंक ने 9,000 से अधिक परिपत्रों को समेकित कर उन्हें 250 से कम कर दिया है। बीमा नियामक IRDAI ने सुधारों के सुझाव हेतु एक समिति गठित की है। पर्यावरण और भवन संहिताओं में जोखिम-आधारित अनुपालन प्रणाली लागू की गई है। उदाहरणस्वरूप, 33 प्रतिशत ‘ग्रीन कवर’ की अनिवार्यता से हटने से औद्योगिक भूमि के 1.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को मुक्त किया गया है। औद्योगिक पार्कों में स्थित इकाइयों को अब अलग-अलग पर्यावरणीय स्वीकृतियों की आवश्यकता नहीं होगी।

‘जन विश्वास’ सुधारों के तहत 200 से अधिक छोटे अपराधों का अपराधमुक्तिकरण किया गया है और सैकड़ों अप्रचलित कानून समाप्त किए गए हैं। कई राज्यों ने मिलकर 1,000 से अधिक अपराधों को अपराधमुक्त करने की पहल की है। यह स्पष्ट संकेत है कि भारत नियंत्रण आधारित शासन से विश्वास आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

एमएसएमई और निर्यात क्षेत्र में भी ठोस हस्तक्षेप किए गए हैं। 200 से अधिक गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCO) को हटाने से छोटे उद्योगों और निर्यातकों पर अनुपालन का बोझ कम हुआ है। वर्ष 2020 से एमएसएमई की परिभाषा में 10 गुना वृद्धि की गई है, जिससे वे पैमाने का लाभ उठा सकें। ₹20,000 करोड़ की नई निर्यात प्रोत्साहन मिशन योजना विशेष रूप से एमएसएमई के लिए सहायक सिद्ध होगी। भारत ने यूके, न्यूज़ीलैंड और ओमान के साथ व्यापार समझौते किए हैं और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के साथ समझौते का क्रियान्वयन भी आरंभ हो चुका है।

ऊर्जा क्षेत्र में, विशेषकर एआई और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों के कारण, खपत में तीव्र वृद्धि देखी जा रही है। बीते कुछ ही दिनों में भारत ने इस क्षेत्र में लगभग 70 अरब डॉलर के निवेश आकर्षित किए हैं। इन नवाचारों को सतत रूप से ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए परमाणु ऊर्जा अहम भूमिका निभा सकती है। इसी दृष्टि से संसद के शीतकालीन सत्र में SHANTI विधेयक पारित किया गया, जो सुरक्षा-प्रथम और निवेश-अनुकूल ढांचे के साथ नागरिक परमाणु परियोजनाओं में निजी और विदेशी भागीदारी की अनुमति देता है, जबकि ईंधन, संवर्धन और पुनर्संसाधन जैसे संवेदनशील क्षेत्र राज्य के नियंत्रण में बने रहेंगे।

ग्रामीण भारत के लिए भी सुधारों की दिशा स्पष्ट है। ग्रामीण रोजगार कानून में न्यूनतम गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन किया गया है और मजदूरी कार्यों को टिकाऊ परिसंपत्तियों, जल सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन और आजीविका अवसंरचना से जोड़ा गया है। शिक्षा क्षेत्र में ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान अधिनियम’ के माध्यम से एकल उच्च शिक्षा नियामक की स्थापना कर UGC, AICTE और NCTE जैसी संस्थाओं के अतिव्यापन को समाप्त किया गया है।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में वर्ष 2025 वास्तव में सुधारों का निर्णायक वर्ष रहा है। ये सुधार आसान नहीं थे—इन्हें लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत दृढ़ता दोनों की आवश्यकता थी। अब यह अपेक्षित है कि राज्य सरकारें भी इस गति को आगे बढ़ाएँ, ताकि सुधार केवल काग़ज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि ज़मीनी स्तर पर परिणाम दें। विश्वास, सरलीकरण और पूर्वानुमेयता—यही 2025 के भारत की पहचान है, और यही विकसित भारत की आधारशिला भी।
(updated on 7th January 2026)

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